बिहार में एक कहावत है— “जब खेत में आग लगे, तब कुछ लोग बाल्टी नहीं, मकई भूनने का जुगाड़ खोजने लगते हैं।” कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों छात्रों के आंदोलन का होता दिख रहा है।
शुरुआत हुई पेपर लीक से। लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा था। युवा सड़क पर थे, सोशल मीडिया पर गुस्सा था, शिक्षक सवाल पूछ रहे थे और स्वतंत्र पत्रकार लगातार जवाब मांग रहे थे। हर तरफ एक ही चर्चा थी— आखिर बार-बार पेपर कैसे लीक हो रहा है और इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
मगर तभी कहानी में पहला ट्विस्ट आ गया।
टीवी स्टूडियो के एसी कमरे से बहस शुरू हुई और चर्चा पेपर लीक से हटकर शिक्षक बनाम मीडिया बन गई। जो सवाल व्यवस्था से पूछा जाना था, वह धीरे-धीरे दूसरी दिशा में मुड़ गया। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी, लोग बंटने लगे और असली मुद्दा पीछे छूटने लगा।
फिर दूसरा ट्विस्ट आया।
अचानक चर्चा का केंद्र “पेपर लीक माफिया” नहीं बल्कि “कोचिंग माफिया” बन गया। ऐसा माहौल बना कि पूरा दोष कोचिंग संस्थानों पर डाल दिया गया। छात्रों का गुस्सा सिस्टम से हटकर शिक्षकों और संस्थानों की तरफ मोड़ दिया गया।
इसके बाद मामला दो शिक्षकों और उनके समर्थकों के बीच की लड़ाई में बदलता दिखाई दिया। जो छात्र कल तक एक मंच पर खड़े थे, वे अलग-अलग खेमों में बंट गए। कोई अपने पसंदीदा शिक्षक के समर्थन में था तो कोई दूसरे के।
लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी।
बिहार की राजनीति में जाति का मसाला सबसे जल्दी बिकता है। सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि कौन किस जाति का है? कौन किसके संरक्षण में है? देखते-देखते पढ़ाई और परीक्षा की चर्चा गायब हो गई और जातीय पहचान चर्चा का विषय बन गई।
और फिर आया सबसे बड़ा मोड़।
जहां बहस शिक्षा व्यवस्था और छात्रों के भविष्य पर होनी चाहिए थी, वहां धर्म की एंट्री हो गई। कुछ प्लेटफॉर्म और कंटेंट क्रिएटरों ने पूरे विवाद को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से दिखाना शुरू कर दिया। नाम, पहचान और धर्म को केंद्र में रखकर ऐसे नैरेटिव गढ़े गए कि असली मुद्दा कहीं पीछे छूट गया।
सवाल यह नहीं है कि कौन किस धर्म या जाति से है।
सवाल यह है कि लाखों छात्रों का भविष्य क्यों दांव पर लगा है?
सवाल यह है कि बार-बार पेपर लीक क्यों हो रहा है?
सवाल यह है कि जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कब होगी?
खान सर हों, रोशन आनंद सर हों या कोई अन्य शिक्षक— अधिकांश छात्र उन्हें उनकी शिक्षा के लिए जानते हैं, उनकी जाति या धर्म के लिए नहीं। जब शिक्षा के मंदिर में जाति और धर्म की राजनीति घुसने लगती है, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी छात्र का होता है जो मेहनत करके अपनी जिंदगी बदलना चाहता है।
आज जरूरत इस बात की है कि बहस फिर से वहीं लौटे जहां से शुरू हुई थी— पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और छात्रों के भविष्य पर।
क्योंकि अगर हर बार असली मुद्दा छोड़कर हम नई बहसों में उलझते रहेंगे, तो फायदा उन्हीं लोगों का होगा जो चाहते हैं कि जनता सवाल पूछना बंद कर दे।
अब फैसला छात्रों और समाज को करना है— लड़ाई पेपर लीक के खिलाफ होगी या फिर जाति और धर्म के नाम पर एक-दूसरे से?













