भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के एक विवादित बयान ने पूरे देश में हलचल मचा दी है। अदालत में सुनवाई के दौरान उन्होंने बेरोजगार युवाओं, आरटीआई एक्टिविस्टों और डिजिटल पत्रकारों को ‘कॉकरोच’ (तिलचट्टा) कहकर संबोधित किया। इस बयान के बाद से सियासत, नागरिक समाज और सोशल मीडिया पर बवाल मचा हुआ है।
सवाल उठ रहे हैं – क्या एक सर्वोच्च पदाधिकारी के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग उचित है? क्या यह न्यायिक गरिमा का उल्लंघन नहीं है? आइए, इस पूरे मामले की बारीकियों को समझते हैं।
क्या हुआ था? पूरा मामला
लाइव लॉ के अनुसार 14 मई 2026 को CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ एक मामले की सुनवाई कर रही थी। इस दौरान CJI ने टिप्पणी की.
“कई ऐसे युवा हैं, जो तिलचट्टों की तरह होते हैं। उन्हें कोई रोजगार नहीं मिलता, न ही वे किसी जॉब में जा पाते हैं। ऐसे में वे RTI एक्टिविस्ट या पत्रकार बन जाते हैं और सोशल मीडिया पर सब पर हमला करते हैं।”
यह बयान वायरल बाहर ही मामला गरमा गया,बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं से लेकर RTI कार्यकर्ताओं और डिजिटल पत्रकारों ने इसे अपना अपमान बताया।
हंगामा क्यों? जानें 3 बड़े कारण
- अपमानजनक तुलना
‘तिलचट्टा’ शब्द घृणा और तिरस्कार का प्रतीक है। किसी भी इंसान, चाहे वह बेरोजगार हो या पत्रकार, या वो अपने जिंदगी मे कुछ भी करे,इससे संबोधित करना अमानवीय और अशोभनीय है।
- बेरोजगारी का मजाक
बेरोजगारी कोई व्यक्तिगत विफलता नहीं होती cji साहब , बल्कि व्यवस्थागत समस्या है। लाखों युवा रोजगार के अभाव में संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें ‘कीट’ कहना निर्दयता और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
- RTI और डिजिटल पत्रकारों का अपमान
RTI एक्टिविस्ट भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकतंत्र के सिपाही हैं। YouTube पत्रकार वह आवाज़ हैं, जहां मेनस्ट्रीम मीडिया चुप रहता है। CJI ने इन जमीनी आवाजों को अपराधी करार दे दिया।
CJI का स्पष्टीकरण – क्या पल्ला झाड़ने की कोशिश?
विवाद बढ़ने पर CJI सूर्यकांत ने सफाई दी कि उनका निशाना “नकली डिग्री वालों” पर था, न कि सभी बेरोजगार युवाओं या पत्रकारों पर।
लेकिन यह सफाई और भी खतरनाक है क्योंकि…
· मूल बयान में ‘नकली डिग्री’ का कोई जिक्र ही नहीं था।
· उन्होंने सीधे “बिना रोजगार वाले युवा” शब्द का इस्तेमाल किया था।
· विवाद बढ़ने के बाद ‘तोड़-मरोड़कर पेश करने’ का रोना रोना घिसी-पिटी रणनीति लगती है।
My Opinion: यह स्पष्टीकरण न तो संतोषजनक है और न ही ईमानदार। CJI को तत्काल सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए। जो व्यक्ति संवैधानिक पद पर बैठा हो और साथ ही न्याय के सबसे ऊंची पायदान पर बैठा हो,उस व्यक्ति से इस तरह की सड़क छाप बयान की उम्मीद ना मैं की थी और ना आम नागरिक ने सोचा होगा!
इतिहास गवाह है – कभी किसी CJI ने ऐसा नहीं कहा
सवाल उठता है – क्या पहले कभी किसी मुख्य न्यायाधीश ने इतना विवादित और अपमानजनक शब्द प्रयोग किया है? आइए ऐतिहासिक तथ्य देखें:
CJI / Judge समय प्रसिद्ध बयान / शैली भाषा की प्रकृति
Justice V.R. Krishna Iyer 1970s “जेल सुधार के लिए है, सजा के लिए नहीं” – मजदूरों के हक में बोले संवेदनशील, मानवतावादी
Justice P.N. Bhagwati 1980s PIL का दरवाजा हर नागरिक के लिए खोला जनहितैषी, सशक्तिकरण करने वाला
Justice J.S. Verma 1990s महिला अधिकार और मीडिया की आज़ादी की पैरवी प्रगतिशील, संविधान समर्पित
Justice Ranjan Gogoi 2018-19 “कांग्रेस बचाओ, देश बचाओ” – विवादित लेकिन अपमानजनक नहीं राजनीतिक टिप्पणी
Justice Surya Kant (वर्तमान) 2026 “बेरोजगार युवा तिलचट्टे हैं, जो RTI/YouTube पत्रकार बनते हैं” अपमानजनक, अमानवीय
अंतरराष्ट्रीय तुलना?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सोनिया सोटोमयोर ने भी विवादित टिप्पणियाँ कीं, लेकिन किसी को ‘तिलचट्टा’ कहने की गलती उन्होंने कभी नहीं की। यह मामला अनोखा और शर्मनाक है।
असली परजीवी कौन है? – वे युवा नहीं जो कैमरा उठाकर सच बोलते हैं, बल्कि वे हैं जो व्यवस्था में बैठकर उसे सड़ने देते हैं और फिर उसी व्यवस्था के शिकार लोगों को ‘तिलचट्टा’ कहते हैं।
विरोध की आग – सड़क से लेकर ट्विटर तक
· RJD सांसद मनोज झा: “लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ों को ‘तिलचट्टा’ कहना लोकतांत्रिक भावना का अपमान है।”
· RTI एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज: “सवाल उठाना लोकतंत्र की जान है। CJI की टिप्पणी ने हमें अपराधी करार दे दिया।”
· ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन: “यह अत्यधिक आपत्तिजनक, अलोकतांत्रिक और घृणित है। CJI को तत्काल माफी मांगनी चाहिए।”
सोशल मीडिया पर तूफान
हैशटैग #CJIApologize, #NoOneIsCockroach और #RTIisRight नंबर-1 पर ट्रेंड कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा:
“जो सच बोलते हैं, आज उन्हें ‘तिलचट्टा’ कहा जा रहा है। कल यही लोग आपकी अदालत के बाहर प्रदर्शन करेंगे।”
एक YouTube पत्रकार ने अपने सिर पर तिलचट्टे का कार्ड लगाकर विरोध किया और कहा – “हाँ हम तिलचट्टे हैं, क्योंकि हम अंधेरे में रोशनी लेकर आते हैं।”
न्यायिक गरिमा बनाम अहंकार
CJI की सीट उन्हें संविधान का सर्वोच्च संरक्षक बनाती है – अधिनायक नहीं। जब वे बोलते हैं, तो उनके शब्दों का वजन कानून जितना होता है। उस सीट पर बैठकर “बेरोजगार – तिलचट्टे” कहना सीट की गरिमा के साथ विश्वासघात है।
“यदि कोई निचली अदालत का जज ऐसा कहता, तो आज उसके खिलाफ महाअभियोग की कार्यवाही शुरू हो गई होती। लेकिन चूंकि वे CJI हैं, इसलिए उनकी गलती को ‘गलतफहमी’ बताया जा रहा है – यही दोहरी मार है।”
जो युवा RTI लड़ रहे हैं,
जो पत्रकार सच बोल रहे हैं,
जो बेरोजगारी की आग में झुलस रहे हैं –
वे आपके ‘तिलचट्टे’ नहीं हैं।
वे उस लोकतंत्र के सिपाही हैं,
जिसकी आप रक्षा करने की कसम खाकर बैठे हैं।













